वास्तु ज्ञान

                           वास्तु ज्ञान की महत्वपूर्ण जानकारियाँ

                                                                                       विश्व बन्धु शर्मा शांडिल्य                                                                                                                                                          

                               वक्र तुंड महाकाय , कोटि सूर्य समप्रभःI

                               निर्विघ्नं कुरु में देवः , सर्व कार्येषु सर्वदा II

         समस्त प्रथ्वी ही नहीं अपितु समस्त ब्रह्माण्ड को उस परम पिता परमात्मा ने एक परम श्रेष्ठ वास्तु विज्ञान के द्वारा ही  निर्मित किया हैं अन्यथा किसी मनुष्य की क्या औकात की ब्रह्माण्ड का प्रादुर्भाव कर सके I बिना सटीक ज्ञान के बिना किसी भी वास्तु का निर्माण असंभव हैं जिसमे सटीक मात्रा व् काल व् स्थिति का होना आवश्यक तत्व हैं,ठीक उसी प्रकार किसी भी भवन के निर्माण में दिशा ज्ञान के साथ किस दिशा में क्या स्थिति होनी चाहिए ? किस दिशा का कौन स्वामी होता हैं आदि के आकलन के साथ यह देखना की घर में किस स्थान में क्या होना चाहिए ,ये सभी बातें वास्तु विज्ञान के अंतर्गत आती हैं.भारत वर्ष में प्राचीन काल से ही बड़े बड़े नगरो का निर्माण वास्तु के अनुरूप होने के प्रमाण मिलते हैं I  भगवान् कृष्ण के द्वारा विश्व कर्मा जी का आह्वाहन करके द्वारिका नगर का निर्माण किया गया था जो वास्तु के अनुरूप था I प्रत्येक मनुष्य अपनी सम्रद्धि चाहता हैं , इसी कारन जीवन में घर के वास्तु के विरुद्ध बना होने के कारन कुछ परेशानी होना संभव हैं , वरन जब किसी मनुष्य पर कोई परेशानी आती हैं तब वह आशंकित हो जाता हैं की कही घर वास्तु के विपरीत तो नहीं बना हैं , तब उस आशंका के समाधान के लिए वास्तु विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित समझा जाता हैं I साथ में एक गुनी वास्तु विशेषज्ञ में ये गुण भी होना चाहिए की घर या मकान में कम से कम टूट फूट कराये और वास्तु शांति के उपाय बताये ताकि शीघ्र वास्तु दोष को दूर किया जा सके Iवास्तु ज्ञान के अंतर्गत महत्त्व पूर्ण बातो का विवेचन दे रहे है I अधिकांश लोग समझते हैं की वास्तु ज्ञान केवल बड़ी बड़ी कोठियो बंगलो में रहने वाले लोगो के लिए ही हैं जबकि वास्तु ज्ञान का लाभ झोपड़ियो में रहने वाले लोग भी बखूबी प्राप्त कर सकते हैं I यही हमार उद्देश्य हैं की सभी वर्गों के लोग समान रूप में हमारे द्वारा दिए गए ज्ञान का लाभ प्राप्त कर सके-
       सर्व प्रथम प्लाट क्रय करने से पूर्व उसकी मिटटी का परिक्षण करने की भी आवश्यकता होती हैं I  साथ ही प्लाट का दक्षिणी पश्चिमी भाग ऊँचा उठा होना चाहिए I और उत्तरी  पूर्वी भाग नीचा होना शुभप्रद होता हैं I इस सबके बाद ही आगे की कार्यवाही की जनि चाहिए , जिसमे भूमि पूजन करने की परंपरा होती हैं I
       सर्व प्रथम वास्तु विशेषज्ञ के लिए दिशा ज्ञान के लिए मेग्नेटिक कम्पास को अपने पास रखना चाहिए I  इस कम्पास में दिशा बताने की खूबी होती हैं इसकी सुई हमेशा उत्तर दिशा और दक्षिण दिशा को बताती हैं , इस यंत्र के द्वारा किसी भी झोपडी मकान कोठी या कारखाने में किसी भी स्थान पर दिशा की जानकारी प्राप्त की जा सकती हैं ,भवन की चारो दिशाओं में पंचमहाभूतो का समन्वय करना ही वास्तव में वास्तु शास्त्र हैं I 
       वास्तु ज्ञान का प्रमुख आधार पञ्च महाभूत हैं यानी पृथ्वी जल वायु आकाश व् अग्नि I इन्ही पंचमहाभूतो से ये मानव शरीर बना होता हैं और इन्ही के आधार पर पृथ्वी का निर्माण भी हुआ हैं I इनमे सर्व प्रथम तत्व पृथ्वी का हैं I
                                                                    पृथ्वी
         सूर्य जीवन के लिए अति आवश्यक हैं सूर्य के चारो ओर चक्कर लगाने वाला गृह पृथ्वी हैं I पृथ्वी एक विराट चुम्बकीय गोला भी हैं जिसके प्रमाण के रूप में चुम्बक को लटका कर रखने पर हमेशा उतार और दक्षिण दिशा को बताता हैं Iउस परम पिता परमात्मा ने अनंत शक्तियों के सम्मिश्रण से इस पृथ्वी को बनाया हैं I  पृथ्वी तत्व: पर्यावरण तथा वायु मंडल की अनंत शक्तियों से पृथ्वी का गहरा सम्बंध है। पृथ्वी तथा अन्य तत्वों से जीवन क्रम का आरम्भ हुआ इसलिए पृथ्वी को माता के समान माना गया है। इसी कारण गृह निर्माण के समय पृथ्वी पूजन करते हैं। अत: पृथ्वी तत्व को भी उचित स्थान भवन बनाते समय देना चाहिये।
इन पांच तत्वों को यथोचित मान देते हुये ही भवन निर्माण करना चाहिये।पृथ्वी तत्व को प्लाट में केंद्र माना जाता हैं अतःकरीब करीब भवन के केन्द्रीय भाग को ऊँचा रखना चाहिए अर्थात भवन का चौक ऊँचा उठा होना चाहिए Iभूखंड का चयन करते समय  

         किसी भी झोपड़ी कोठी या कारखाने के लिए सबसे अहम् तत्व पृथ्वी ही होता हैं बिना पृथ्वी के किसी भी गृह या कारखाने का निर्माण असंभव  हैं I  पृथ्वी तत्व के अंतर्गत वर्गाकार जमीन सर्व श्रेष्ठ मानी गयी हैं I अर्थात जिस स्थान की चारो भुजाए समान हो वह भूमि वर्गाकार कहलाती हैं. इसके बाद आयताकार भूमि दूसरे नंबर पर श्रेष्ठ होती हैं, जिसमे आमने सामने की भुजाये समान होती हैं लेकिन चारो भुजाये समान नहीं होती I वृत्ताकार प्लाट भी शुभ माना गया हैं I समान भुजाओ वाला षष्ठकोणीय प्लाट को भी शुभता की द्रष्टि से शुभ माना जाता हैं I इसके अलावा अन्य प्रकार की भूमि जैसे त्रिकोणीय भूमि को अपयश मानसिक कष्ट दायक माना गया हैं I पञ्च कोणीय , षष्ठ कोणीय या अधिक कोण वाली , अंडाकार भूमि भी नेष्ट मानी गयी हैं तथापि मंदिर मैथ आदि के लिए शुभ मानी गयी हैं ,चंद्राकार ,अर्धवृत्ताकार भूमि नेष्ट फल देने वाली मानी गयी हैं I जहां तक संभव हो सके वर्गाकार या आयताकार भूमि का चयन किया जाना सर्वश्रेष्ठ होगा I  भवन का मध्य भाग ऊँचा उठा होना चाहिए Iइसके विपरीत दिशा में ढलान का होना शुभ नहीं होता हैं I

           दरवाजे की दिशा -

          भवन के मुख्य द्वार का पूर्व दिशा में होना शुभ होता हैं I दूसरे उत्तर दिशा की ओर दरवाजा होना चाहिए I उत्तर की ओर भी मुख्य द्वार शुभ होता हैं , इसके अलावा पश्चिम की ओर मुख्य द्वार मध्यम रूप में शुभ माना गया हैं I दक्षिण दिशा की ओर भवन का मुख्य द्वार का होना नेष्ट माना जाता हैं I तथापि भवन के दरवाजे केवल पूर्व और उत्तर की ओर ही हो ऐसा संभव नहीं होता I किसी न किसी को तो उन भवनों में भी निवास करना ही होता हैं जिनका मुख्य द्वार दक्षिण या पश्चिम की ओर होता हैं I तब भी उन स्थितियों में सूक्ष्म उपाय किये जा सकते हैं I ताकि भवन शुभ फल दायक बन जाये I भवन के लिए चयनित भूमि के दक्षिण व् पश्चिम भाग में अन्य प्लाट अगर ऊँचे हो तब भी चयनित भूमि शुभ होती हैं I लेकिन उत्तर और पूर्व में दूसरे प्लाट निचाई में ही होने  चाहिए Iधनुषाकार अर्धवृत्ताकार ,रथाकार ,फर्साकार ,ताराकार, कछुआकार त्रिशुलाकार , चंद्राकार अस्ठाकार भूमि भी नेस्ट फल दायक मानी गयी हैं Iतब भी इस प्रकार की भूमि में कमरों का आकार यदि वर्गाकार बना लिया जाये तब भी नेष्ट फल को दूर किया जा सकता हैं I शेष बची हुई भूमि को खाली स्थान की तरह छोड़ा जा सकता हैं I